भूख न लगना (अरुचि व मंदाग्नि) के लिए ताजा अदरक का घरेलू औषधीय प्रयोग
- **भूख की कमी:** पुदीने की पत्तियों और काले नमक का हल्का पेय दें; आधा चम्मच अदरक का रस शहद के साथ चटाएं।
आयुर्वेद में डिटॉक्स का अर्थ भूखे रहना या कच्चे ठंडे जूस पीना नहीं है (जो जठराग्नि को नष्ट कर वात बढ़ा देते हैं)। चरक संहिता की 4-चरणीय शास्त्रीय शोधन विधि: पहले दीपन-पाचन से आम पचाएं, फिर स्नेहपान से विषाक्त तत्व ढीले करें और सुरक्षित विरेचन से बाहर निकालें।
नीचे दिए गए लक्षणों में से जो आप नियमित अनुभव करते हैं, उन्हें चुनें। 3 या अधिक लक्षण होने पर शास्त्रीय दीपन-पाचन शोधन अनिवार्य है।
शास्त्रीय विधि: दिन भर गुनगुना CCF अर्क (जीरा, धनिया, सौंफ का पानी) घूंट-घूंट पिएं। दोपहर व रात के भोजन से 15 मिनट पूर्व चुटकी भर त्रिकटु चूर्ण गुनगुने पानी से लें। दूध, तेल, घी व ठंडी चीजों का पूर्ण त्याग रखें।
शास्त्रीय विधि: प्रातः खाली पेट गुनगुना देसी गाय का घी पिएं: दिन 4 को 30 मिली, दिन 5 को 45 मिली, दिन 6 को 60 मिली। जब तक तेज भूख न लगे (4-6 घंटे) तब तक केवल गुनगुना पानी पिएं। भोजन में केवल मूंग दाल की पतली खिचड़ी लें।
शास्त्रीय विधि: हल्के गुनगुने तिल के तेल से मालिश के बाद 15 मिनट गर्म भाप या गर्म पानी से स्नान करें। पेट व कमर पर सोंठ के गर्म पानी की सिकाई करें।
शास्त्रीय विधि: रात 9:30 बजे 20 मिली शुद्ध अरंडी का तेल (कैस्टर ऑयल) 150 मिली गुनगुने दूध या सोंठ के पानी में मिलाकर पिएं। सुबह 3 से 5 बार पेट खुलकर साफ होगा। शरीर में निर्जलीकरण न होने दें, गुनगुना सेंधा नमक पानी लें।
14 गुना पानी में चावल उबालकर छाना हुआ पतला मांड। कोई ठोस कण नहीं। कमजोर जठराग्नि के लिए सर्वोत्तम अमृत।
पतली चावल की पेया जिसमें थोड़े गले हुए दाने हों (1:8 अनुपात)। भुना जीरा व सेंधा नमक युक्त।
गाढ़ी चावल की विलेपी (1:4 अनुपात) जिसमें आधा चम्मच देसी घी मिला हो। धातुओं को स्थिरता देती है।
मूंग दाल का सूप (यूँष) और हल्की खिचड़ी। इसके बाद धीरे-धीरे सामान्य सात्विक भोजन प्रारंभ करें।