हठयोग प्रदीपिका, घेरण्ड संहिता एवं शिव संहिता के मूल श्लोक, पदच्छेद (पदार्थ), यौगिक रहस्य एवं त्रि-ध्वनि गुरु व्याख्यान।
कल्याण अस्वीकरण / Wellness Disclaimer:
यहाँ प्रस्तुत योग अभ्यास, मुद्राएँ और श्वास तकनीकें शास्त्रीय परंपरा पर आधारित हैं और केवल शैक्षिक, कल्याण और समग्र जीवनशैली के उद्देश्यों के लिए हैं। ये किसी चिकित्सीय सलाह, निदान या उपचार का विकल्प नहीं हैं। कोई भी नया शारीरिक अभ्यास शुरू करने से पहले, विशेष रूप से यदि आपको पहले से कोई स्वास्थ्य समस्या है या आप गर्भवती हैं, तो योग्य चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें। अपने शरीर की सहज सीमा में ही अभ्यास करें।
पदार्थ (शब्दार्थ):
श्रीआदिनाथाय (To Sri Adinatha / Shiva) नमः अस्तु (salutations be) तस्मै (to him) येन (by whom) उपदिष्टा (was taught) हठयोगविद्या (the science of Hatha Yoga) | या (which) राजयोगम् (to Raja Yoga) आरोढुम् इच्छोः (for one wishing to ascend) अधिरोहिणी इव (like a ladder) विभ्राजते (shines forth).
भावार्थ:
श्री आदिनाथ (भगवान शिव) को नमस्कार है, जिन्होंने हठयोग विद्या का उपदेश दिया—जो सर्वोच्च राजयोग के शिखर पर आरोहण करने के इच्छुक साधक के लिए सीढ़ी के समान सुशोभित है।
यौगिक रहस्य व भाष्य:
स्वात्माराम स्पष्ट करते हैं कि हठयोग केवल शारीरिक कसरत नहीं है, बल्कि राजयोग और समाधि की प्राप्ति के लिए अनिवार्य आधारशिला और सीढ़ी है।
atyāhāraḥ prayāsaś ca prajalpo niyamāgrahaḥ |
jana-saṅgaś ca laulyaṁ ca ṣaḍbhir yogo vinaśyati ||
पदार्थ (शब्दार्थ):
अत्याहारः (Overeating) प्रयासः (overexertion) च (and) प्रजल्पः (excessive talkativeness) नियमाग्रहः (rigid adherence to unyielding rules) जनसङ्गः (company of unmindful people) च लौल्यम् (unsteady wavering mind) च षड्भिः (by these six) योगः (yoga) विनश्यति (is destroyed).
भावार्थ:
छह कारणों से योग नष्ट हो जाता है: अधिक भोजन करना (अत्याहार), अत्यधिक शारीरिक श्रम, व्यर्थ की बकवास, नियमों का हठपूर्वक पालन, जनसमूह में अधिक संगति, और चित्त की चंचलता।
यौगिक रहस्य व भाष्य:
ये छह बाधक तत्व साधक को संयम, संतुलन और आंतरिक मौन बनाए रखने का निर्देश देते हैं।
पदार्थ (शब्दार्थ):
हठस्य (Of Hatha Yoga) प्रथमाङ्गत्वात् (being the first limb) आसनम् (posture) पूर्वम् (first) उच्यते (is expounded) | तत् (that) आसनम् (asana) स्थैर्यम् (steadiness) आरोग्यम् (freedom from disease / optimal health) अङ्गलाघवम् च (and lightness of body) कुर्यात् (produces).
भावार्थ:
हठयोग का प्रथम अंग होने के कारण आसन का वर्णन सबसे पहले किया गया है। आसन का सम्यक अभ्यास शरीर और मन में स्थिरता (स्थैर्य), उत्तम स्वास्थ्य (आरोग्य) और अंगों में हल्कापन (लाघव) उत्पन्न करता है।
यौगिक रहस्य व भाष्य:
यह शास्त्रीय हठयोग में आसन के तीन प्रमुख फलों—स्थिरता, स्वास्थ्य और हल्कापन का मूल सूत्र है।
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द्वितीय उपदेश: षट्कर्म एवं अष्टकुम्भक
प्रमुख विषय: नाड़ी शुद्धि, 6 शोधन कर्म (नेति, धौति, नौलि आदि) एवं 8 महाकुम्भक (उज्जायी, भस्त्रिका, शीतली आदि)
cale vāte calaṁ cittaṁ niścale niścalaṁ bhavet |
yogī sthāṇutvam āpnoti tato vāyuṁ nirodhayet ||
पदार्थ (शब्दार्थ):
चले वाते (When breath moves / is unsteady) चलम् (unsteady becomes) चित्तम् (the mind) | निश्चले (when breath is still) निश्चलम् भवेत् (the mind becomes motionless) | योगी (the yogi) स्थाणुत्वम् (unshakeable stability) आप्नोति (attains) ततः (therefore) वायुम् (the breath / prana) निरोधयेत् (should restrain / regulate).
भावार्थ:
जब श्वास चंचल होता है तो चित्त भी चंचल हो जाता है, और जब श्वास निश्चल (स्थिर) होता है तो चित्त भी स्थिर हो जाता है। इससे योगी परम स्थिरता को प्राप्त होता है, अतः साधक को प्राणवायु का नियमन करना चाहिए।
यौगिक रहस्य व भाष्य:
श्वास और चित्त की परस्पर निर्भरता का यह हठयोग का सबसे प्रसिद्ध और आधारभूत वैज्ञानिक सूत्र है।
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HYP 2.22
धौतिर्बस्तिस्तथा नेतिस्त्राटकं नौलिकं तथा ।
कपालभातिश्चैतानि षट्कर्माणि प्रचक्षते ॥
पदार्थ (शब्दार्थ):
धौतिः (Dhauti) बस्तिः (Basti) तथा (and) नेतिः (Neti) त्राटकम् (Trataka) नौलिकम् (Nauli) तथा (and) कपालभातिः (Kapalabhati) च (and) एतानि (these) षट्कर्माणि (the six cleansing actions) प्रचक्षते (are proclaimed).
भावार्थ:
धौति, बस्ति, नेति, त्राटक, नौलि और कपालभाति—इन छह शुद्धिकरण क्रियाओं को 'षट्कर्म' कहा जाता है।
यौगिक रहस्य व भाष्य:
षट्कर्म त्रिदोषों के संतुलन और नाड़ियों की शुद्धि के लिए प्राणायाम से पूर्व किए जाने वाले शोधन कर्म हैं।
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तृतीय उपदेश: मुद्रा एवं बंध
प्रमुख विषय: कुंडलिनी जागरण, 10 महामुद्राएं, मूल बंध, उड्डियान बंध, जालंधर बंध एवं विपरीतकरणी
पदार्थ (शब्दार्थ):
तस्मात् (Therefore) सर्वप्रयत्नेन (with every conscious effort) ब्रह्मद्वारमुखे (at the portal of the Brahma Nadi / Sushumna) सुप्ताम् (sleeping) ईश्वरीम् (the primordial sovereign energy / Kundalini) प्रबोधयितुम् (to awaken) मुद्राभ्यासम् (the practice of Mudras) समाचरेत् (one should diligently perform).
भावार्थ:
अतः सुषुम्ना के द्वार पर सुप्त पड़ी हुई ईश्वरी (कुंडलिनी शक्ति) को जाग्रत करने के लिए साधक को संपूर्ण यत्नपूर्वक मुद्राओं का अभ्यास करना चाहिए।
यौगिक रहस्य व भाष्य:
मुद्राएं प्राण और अपान को मिलाकर सुषुम्ना में प्रवाहित करने के सूक्ष्म तांत्रिक द्वार हैं।
udare paścimaṁ tānaṁ nābher ūrdhvaṁ ca kārayet |
uḍḍīyāno hy asau bandho mṛtyu-mātaṅga-kesarī ||
पदार्थ (शब्दार्थ):
उदरे (In the abdomen) नाभ्याः ऊर्ध्वम् (above the navel) पश्चिमम् तानम् (draw backward against the spine) कारयेत् (let one perform) | असौ (this) उड्डीयानः बन्धः (Uddiyana Bandha) मृत्युमातङ्गकेसरी (is like a lion to the elephant of death).
भावार्थ:
उदर को नाभि से ऊपर की ओर पीछे रीढ़ की हड्डी की तरफ खींचें। यह 'उड्डीयान बंध' कहलाता है, जो मृत्यु रूपी मदमस्त हाथी के लिए सिंह के समान विनाशक है।
यौगिक रहस्य व भाष्य:
उड्डियान बंध आंतों और पेट के अंगों की मालिश करता है तथा अपान वायु को ऊपर उठाकर प्राण से मिलाता है।
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चतुर्थ उपदेश: समाधि एवं नादानुसंधान
प्रमुख विषय: समाधि की स्थिति, मनोन्मनी भाव, लय योग, चार साधना अवस्थाएं (आरम्भ, घट, परिचय, निष्पत्ति) एवं अनाहत नाद श्रवण