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पतंजलि का अष्टांग मार्ग

अष्टांग — योग के आठ अंग

नैतिक जीवन, शारीरिक स्थिरता और श्वास से समाधि तक — योग का समग्र वैज्ञानिक मार्ग।

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अंग
समग्र मार्ग
ऑडियो व्याख्यान
अष्टांग योग — महर्षि पतंजलि द्वारा योग सूत्रों में प्रतिपादित आठ अंगों का मार्ग — मानव चेतना के रूपांतरण का एक समग्र और वैज्ञानिक रोडमैप है। यह नैतिक आचरण, शारीरिक संतुलन, प्राण वायु नियमन, इंद्रिय प्रत्याहार, मानसिक एकाग्रता, ध्यान और आत्म-साक्षात्कार को एक सूत्र में पिरोता है। यह मात्र व्यायाम नहीं, बल्कि मानसिक क्लेशों से मुक्ति और जीवन के सर्वोच्च विकास का मार्ग है।
अभ्यास का प्रत्यक्ष लाभ

अष्टांग योग का अध्ययन और अभ्यास क्यों करें?

मन, शरीर और तंत्रिका तंत्र पर नियंत्रण का संपूर्ण मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण।

शारीरिक व मेरुदंड स्वास्थ्य

आसन और प्राणायाम रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाते हैं, आंतरिक अंगों को उत्तेजित करते हैं और शारीरिक दर्द दूर करते हैं।

तंत्रिका तंत्र का संतुलन

प्राणायाम और प्रत्याहार तनाव हार्मोन (कोर्टिसोल) को कम कर तंत्रिका तंत्र को गहरी शांति और पुनर्जनन में लाते हैं।

डिजिटल व संवेदी डिटॉक्स

प्रत्याहार मस्तिष्क को सोशल मीडिया, स्क्रीन और बाहरी शोर के लगातार खिंचाव से मुक्त कर आंतरिक मौन सिखाता है।

एकाग्रता व फ्लो स्टेट

धारणा और ध्यान मस्तिष्क के न्यूरोप्लास्टिसिटी को मजबूत करते हैं, जिससे गहन कार्य एकाग्रता और मानसिक स्पष्टता मिलती है।

नैतिक स्वतंत्रता व आंतरिक शांति

यम और नियम जीवन में ईमानदारी, संतोष और अनुशासन लाते हैं, जिससे अपराधबोध और आंतरिक तनाव पूरी तरह समाप्त हो जाते हैं।

1
यम — सामाजिक नैतिकता व सार्वभौमिक संयम
यम (Yama)
यम: नैतिक स्वतंत्रता की नींव
00:00 04:15

Welcome to the first limb of classical Ashtanga Yoga: Yama. Sage Patanjali places moral discipline not as a dogmatic commandment, but as an indispensable energetic foundation. When our social life is filled with deceit, exploitation, or greed, the nervous system remains in perpetual hyper-vigilance. By practicing Ahimsa, Satya, Asteya, Brahmacharya, and Aparigraha, we dissolve subconscious guilt and fear. The mind becomes naturally tranquil, creating an unshakeable ground for meditation.

YS 2.30
अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः
Ahimsa-satya-asteya-brahmacarya-aparigraha yamah
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह — ये पाँच यम हैं।

अभ्यास का लाभ

सामाजिक टकराव, मानसिक अपराधबोध और कलह को समाप्त करता है। मन की शांति और गहरे ध्यान के लिए आवश्यक नैतिक आधार प्रदान करता है।

वैज्ञानिक व तंत्रिका आधार

नैतिक संघर्ष और सामाजिक तनाव एमिग्डाला को उत्तेजित रखते हैं। यम का आचरण तनाव हार्मोन को घटाकर हृदय गति परिवर्तनशीलता (HRV) को बढ़ाता है।

अहिंसा
मन, वचन और कर्म से किसी भी जीव को कष्ट न पहुँचाना और करुणा का भाव रखना।
स्वयं के प्रति कठोर आलोचनात्मक विचार बंद करें और दूसरों के प्रति धैर्य रखें।
सत्य
सच्चाई का पालन करना जो दूसरों के कल्याण के अनुकूल हो और जिसमें कोई छल न हो।
बिना बढ़ा-चढ़ाए और बिना दिखावे के ईमानदारी से बात करें।
अस्तेय
दूसरों की वस्तु, समय, विचार या अधिकारों पर अनुचित अधिकार न जताना।
दूसरों के समय का सम्मान करें और उनके काम का श्रेय स्वयं न लें।
ब्रह्मचर्य
इंद्रिय वासनाओं पर नियंत्रण और अपनी प्राण शक्ति को उच्च लक्ष्यों की ओर निर्देशित करना।
अपनी रचनात्मक और मानसिक ऊर्जा को व्यर्थ की उत्तेजनाओं से बचाकर साधना में लगाएँ।
अपरिग्रह
आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना और सांसारिक वस्तुओं में अत्यधिक आसक्ति न रखना।
अपने जीवन को सरल बनाएं और नई चीजें खरीदने की निरंतर भूख से मुक्त हों।
दैनिक क्रिया आज किसी भी बातचीत में उत्तर देने से पहले 3 गहरी सांस लें और पूछें: क्या मेरा उत्तर दयालु (अहिंसा), सत्य (सत्य) और निष्कपट (अस्तेय) है?
आत्म-चिंतन प्रश्न इन पाँच यमों में से कौन सा मेरे लिए सबसे चुनौतीपूर्ण है, और मेरा अहंकार कहाँ सबसे अधिक आसक्ति महसूस करता है?
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2
नियम — व्यक्तिगत अनुशासन व आंतरिक शुद्धि
नियम (Niyama)
नियम: आत्म-विजय की आंतरिक साधना
00:00 04:30

Niyama is your private, intimate relationship with yourself. While Yama governs how you engage with society, Niyama governs what you do when no one is watching. Through Shaucha, we keep the bodily temple spotless. Through Santosha, we cut the root of neurotic chasing. Tapas provides the forge to melt our addictions, Svadhyaya offers the lantern of wisdom, and Ishvara Pranidhana relaxes our frantic grip on control.

YS 2.32
शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः
Sauca-santosa-tapah-svadhyaya-isvarapranidhanani niyamah
शौच (पवित्रता), संतोष, तप (तपस्या), स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान — ये पाँच नियम हैं।

अभ्यास का लाभ

आंतरिक शुद्धि, इच्छाओं पर विजय, मानसिक स्पष्टता और किसी भी परिस्थिति में स्थिर रहने वाला आंतरिक आनंद प्रदान करता है।

वैज्ञानिक व तंत्रिका आधार

दैनिक अनुशासन और कृतज्ञता की भावना मस्तिष्क में डोपामाइन संतुलन और प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स की कार्यप्रणाली को सुदृढ़ करती है।

शौच
शरीर, खानपान, विचारों और परिवेश की शुद्धता व स्वच्छता।
सात्विक भोजन ग्रहण करें और नकारात्मक सोशल मीडिया से अपने मन को दूर रखें।
संतोष
वर्तमान में जो प्राप्त है उसमें तृप्त रहना और व्यर्थ की लालसाओं से मुक्त होना।
दूसरों से तुलना किए बिना आज अपने जीवन और अभ्यास की सराहना करें।
तप
आलस्य और दुर्बलताओं को भस्म करने वाला दृढ़ आत्म-अनुशासन और नियमित अभ्यास।
मन न होने पर भी निर्धारित समय पर अपने अभ्यास और कर्तव्य के लिए उपस्थित रहें।
स्वाध्याय
प्राचीन सदग्रंथों का अध्ययन और अपनी आदतों, भावनाओं व प्रतिक्रियाओं का आत्म-निरीक्षण।
प्रतिदिन एक श्लोक का अध्ययन करें और अपने मानसिक व्यवहार का निष्पक्ष अवलोकन करें।
ईश्वर प्रणिधान
अहंकार का त्याग कर अपने कर्मों के फल को परमात्मा या ब्रह्मांडीय सत्य को समर्पित करना।
अपना शत-प्रतिशत प्रयास करें और परिणाम की चिंता से मुक्त होकर प्रभु पर भरोसा रखें।
दैनिक क्रिया आज 10 मिनट अपने कार्यस्थल की सफाई (शौच) में और 5 मिनट किसी प्रेरणादायक ग्रंथ के स्वाध्याय में लगाएं।
आत्म-चिंतन प्रश्न क्या मैं अपने संतोष को भविष्य की किसी उपलब्धि पर टाल रहा हूँ, या इसी क्षण संतोष का अनुभव कर सकता हूँ?
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3
आसन — स्थिर व सुखमय शारीरिक मुद्रा
आसन (Asana)
आसन: स्थिरता और सहजता का विज्ञान
00:00 04:10

Patanjali defines asana in just three words: Sthira-Sukham Asanam. Steady and comfortable. Notice he does not demand contortionism or acrobatic acrobatics. The physical posture is an instrument to quiet the motor nerves. When the body is fidgety, the breath is erratic, and the mind is stormy. By establishing somatic stability, the duality between body and consciousness begins to dissolve.

YS 2.46
स्थिरसुखमासनम्
Sthira-sukham asanam
आसन स्थिरता और सुख से युक्त होना चाहिए।

अभ्यास का लाभ

मांसपेशियों के तनाव को दूर करता है, रीढ़ को सीधा व लचीला बनाता है और शरीर को ध्यान में लंबे समय तक बैठने योग्य बनाता है।

वैज्ञानिक व तंत्रिका आधार

मांसपेशियों के जोड़ों पर दबाव कम करता है, लचीलापन बढ़ाता है और केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को स्थिर कर शारीरिक बेचैनी समाप्त करता है।

स्थिरता
बिना हिले-डुले शरीर को संतुलित और दृढ़ रखना।
ताड़ासन में पैरों को भूमि पर दृढ़ता से जमाकर पर्वत की भांति अचल खड़े रहें।
सुखम्
मुद्रा में किसी प्रकार का दर्द या तनाव न होना, सहज और प्रसन्न मुद्रा।
मुद्रा में रहते हुए जबड़े और माथे को तनावमुक्त रखें और सहज श्वास लें।
प्रयत्न शैथिल्य
सही मुद्रा बन जाने के बाद अतिरिक्त बल और तनाव को पूरी तरह शिथिल कर देना।
योद्धा आसन में स्थिर होने के बाद कंधों और गर्दन के व्यर्थ तनाव को छोड़ दें।
अनंत समापत्ति
शरीर की चेतना को असीम आकाश या अनंत शक्ति में विलीन करना।
शवासन में शरीर की सीमाओं को भूलकर विराट चेतना का अनुभव करें।
दैनिक क्रिया आज 15 मिनट सचेत आसन करें और प्रत्येक मुद्रा में स्थिरता तथा सुख की अनुभूति पर ध्यान केंद्रित करें।
आत्म-चिंतन प्रश्न क्या मैं आसन अहंकार और प्रदर्शन के लिए कर रहा हूँ, या अपने शरीर मंदिर को पवित्र और स्थिर बनाने के लिए?
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4
प्राणायाम — प्राण शक्ति का विस्तार व नियमन
प्राणायाम (Pranayama)
प्राणायाम: जीवन ऊर्जा का वैज्ञानिक नियंत्रण
00:00 04:20

Breath is the bridge between the physical body and subtle consciousness. You cannot directly tell an anxious brain to stop worrying, but by altering the rhythm, depth, and duration of the breath, you immediately modulate your heart rate, vagal tone, and brainwaves. Pranayama burns the veil that covers inner radiance, opening the gate to deep meditation.

YS 2.49
तस्मिन्सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः
Tasmin sati svasa-prasvasayor-gati-vicchedah pranayamah
आसन सिद्ध होने पर श्वास और प्रश्वास की स्वाभाविक गति को नियंत्रित व विस्तारित करना प्राणायाम है।

अभ्यास का लाभ

मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों को संतुलित करता है, फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ाता है और मन की चंचलता को तत्काल शांत करता है।

वैज्ञानिक व तंत्रिका आधार

वेगस तंत्रिका को सक्रिय कर पैरासिम्पेथेटिक टोन बढ़ाता है, जिससे हृदय गति और रक्तचाप सामान्य होते हैं और मस्तिष्क में अल्फा तरंगें उत्पन्न होती हैं।

पूरक
श्वास को धीमे, गहरे और लयबद्ध तरीके से भीतर भरना।
चार की गिनती तक धीरे-धीरे श्वास अंदर लें और पसलियों के फैलाव को महसूस करें।
कुम्भक
श्वास को अंदर या बाहर रोककर आंतरिक चेतना को स्थिर करना।
गले पर जोर दिए बिना श्वास रोकें और उस मौन का अनुभव करें।
रेचक
श्वास को पूरी तरह और धीरे-धीरे बाहर छोड़ना।
पूरक से दोगुने समय में धीरे-धीरे श्वास छोड़ें ताकि तनाव पूरी तरह बाहर निकल सके।
केवल कुम्भक
वह अवस्था जहां बिना किसी प्रयास के श्वास स्वतः शांत होकर ठहर जाती है।
गहरे ध्यान में श्वास के स्वतः रुकने पर होने वाले परम शांति के अनुभव को जानें।
दैनिक क्रिया आज दोपहर के भोजन से पहले या सोने से पूर्व 10 मिनट नाड़ी शोधन प्राणायाम का अभ्यास करें।
आत्म-चिंतन प्रश्न जब मुझे गुस्सा या चिंता होती है, तो मेरी श्वास कैसे तेज हो जाती है? क्या मैं 3 लंबी श्वास छोड़कर तुरंत शांत हो सकता हूँ?
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5
प्रत्याहार — इंद्रिय निवृत्ति व अंतर्मुखता
प्रत्याहार (Pratyahara)
प्रत्याहार: इंद्रियों की गुलामी से मुक्ति
00:00 04:00

Pratyahara is the pivotal bridge connecting the external practices of yoga with internal meditation. In our hyper-connected modern world, your attention is the most valuable commodity being harvested. Pratyahara is your declaration of cognitive independence. Like a turtle withdrawing into its shell during a storm, you pull your five senses back into the quiet sanctuary of the heart.

YS 2.54
स्वविषयासंप्रयोगे चित्तस्य स्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः
Sva-visaya-asamprayoge cittasya svarupanukara ivendriyanam pratyaharah
जब इंद्रियां अपने बाहरी विषयों से हटकर चित्त के स्वरूप में लीन हो जाती हैं, उसे प्रत्याहार कहते हैं।

अभ्यास का लाभ

बाहरी विकर्षणों और स्क्रीन से होने वाली मानसिक थकान को दूर करता है। इंद्रियों को वश में कर मन की ऊर्जा को भीतर सुरक्षित रखता है।

वैज्ञानिक व तंत्रिका आधार

थैलेमस में बाहरी संवेदी सूचनाओं के प्रवाह को नियंत्रित करता है, जिससे मस्तिष्क को अत्यधिक उत्तेजना से राहत मिलती है।

इंद्रिय निग्रह
कछुए की तरह अपनी पांचों इंद्रियों को बाहरी आकर्षणों से समेटकर भीतर कर लेना।
बाहरी आवाजों को सुनते हुए भी उन पर प्रतिक्रिया न दें और भीतर स्थिर रहें।
मानसिक डिटॉक्स
सोशल मीडिया, समाचार और अनावश्यक गपशप से मन को जानबूझकर अलग रखना।
सोने से एक घंटा पहले सभी डिजिटल उपकरण पूरी तरह बंद रखें।
अंतर्मुखी चेतना
दृष्टि को बाहर से हटाकर अपनी आंतरिक श्वास और आत्मिक मौन की ओर ले जाना।
आंखें बंद कर अपने हृदय की धड़कन और भीतरी मौन को सुनें।
दैनिक क्रिया आज शाम 30 मिनट का पूर्ण मौन और स्क्रीन-मुक्त उपवास रखें। आंखें बंद कर केवल आंतरिक शांति का अनुभव करें।
आत्म-चिंतन प्रश्न मेरी दैनिक मानसिक थकान में स्मार्टफोन और स्क्रीन की लगातार उत्तेजना का कितना बड़ा हिस्सा है?
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6
धारणा — एकाग्रता व ध्येय पर चित्त का ठहराव
धारणा (Dharana)
धारणा: बिखरी हुई मानसिक किरणों का संकेंद्रण
00:00 04:15

A dispersed mind is like scattered sunlight; it warms, but burns nothing. When you take a magnifying glass and focus those same rays into a single pinpoint, it ignites fire. Dharana is that lens for human consciousness. By binding attention to a single chosen space, the habitual wandering of the mind is arrested. Dharana is the deliberate effort that matures into the effortless flow of Dhyana.

YS 3.1
देशबन्धश्चित्तस्य धारणा
Desa-bandhas cittasya dharana
चित्त को किसी एक देश (स्थान या वस्तु) पर बांध देना या टिका देना ही धारणा है।

अभ्यास का लाभ

मन के भटकाव को रोकता है, याददाश्त बढ़ाता है और किसी भी काम को बिना विचलित हुए पूर्ण एकाग्रता से करने की शक्ति देता है।

वैज्ञानिक व तंत्रिका आधार

मस्तिष्क के डोर्सल अटेंशन नेटवर्क को मजबूत करता है, जिससे ध्यान भटकने की दर बहुत घट जाती है और फोकस तीव्र होता है।

बाह्य धारणा
दीपक की लौ, यन्त्र या किसी पवित्र बिंदु पर बिना पलक झपकाए दृष्टि टिकाना।
तीन मिनट तक बिना हिले किसी एक बिंदु पर अपनी दृष्टि और ध्यान टिकाएं।
आभ्यंतर धारणा
शरीर के भीतर किसी चक्र (हृदय, आज्ञा चक्र) या नासिका के अग्रभाग पर मन को बांधना।
नासिका के छिद्रों पर अंदर आती ठंडी और बाहर जाती गर्म श्वास पर ध्यान केंद्रित करें।
पुनरावर्तन
मन के भटकने पर बिना क्रोधित हुए उसे बार-बार उसी ध्येय बिंदु पर वापस ले आना।
जब भी कोई विचार आए, उसे शांत भाव से देखकर पुनः अपने ध्यान बिंदु पर लौट आएं।
दैनिक क्रिया आज 10 मिनट बैठें और अपना पूरा ध्यान केवल नासिका के अग्रभाग पर आने-जाने वाली श्वास पर केंद्रित रखें।
आत्म-चिंतन प्रश्न मेरा मन एक काम करते हुए कितनी बार दूसरे विचारों या मोबाइल पर भटकता है? क्या मैं उसे पकड़ पा रहा हूँ?
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7
ध्यान — अखंड चेतना का अविरल प्रवाह
ध्यान (Dhyana)
ध्यान: अखंड मौन का पावन प्रवाह
00:00 04:25

Dhyana is the effortless blossoming of Dharana. In concentration, there is still the triplicity of the observer, the process of observing, and the object. In Dhyana, these boundaries soften. Patanjali describes this flow with the classical metaphor of Tailadhara: like oil poured from one vessel to another in a continuous, unbroken, silent stream. The restless ego recedes, and the true witness self shines.

YS 3.2
तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्
Tatra pratyayaika-tanata dhyanam
उस ध्येय वस्तु में ज्ञान की एकरसता या चेतना का अखंड तार बहना ही ध्यान है।

अभ्यास का लाभ

चिंता, अवसाद और मानसिक तनाव को जड़ से मिटाता है। आंतरिक शांति, अंतःप्रेरणा और आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति कराता है।

वैज्ञानिक व तंत्रिका आधार

मस्तिष्क में डीप थीटा और गामा तरंगों को सक्रिय करता है, हिप्पोकैम्पस में नए न्यूरॉन्स का निर्माण करता है और तनाव को समाप्त करता है।

तैलधारावत् प्रवाह
जैसे एक बर्तन से दूसरे बर्तन में तेल की अखंड धार गिरती है, वैसे ही चेतना का ध्येय में बहना।
बिना किसी प्रयास के लगातार कई मिनटों तक आंतरिक शांति में लीन रहना।
साक्षी भाव
विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को बिना जुड़े एक तटस्थ दर्शक की भांति देखना।
क्रोध या भय को आकाश में तैरते बादलों की तरह देखें और स्वयं को निर्लिप्त आकाश समझें।
आनंद प्रकाश
बिना किसी बाहरी कारण के भीतर से स्वाभाविक आनंद और शांति का प्रस्फुटन।
केवल अस्तित्व में होने मात्र से परम संतुष्टि और आनंद का अनुभव करना।
दैनिक क्रिया आज 15 मिनट शांत बैठकर ध्यान करें। विचारों से लड़ें नहीं, बस एक साक्षी बनकर उन्हें आते-जाते देखें।
आत्म-चिंतन प्रश्न क्या मैं यह समझ पा रहा हूँ कि मैं अपने अस्थिर विचार नहीं, बल्कि वह असीम चेतना हूँ जिसमें विचार उठते हैं?
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8
समाधि — पूर्ण एकात्मता, आत्म-साक्षात्कार व कैवल्य
समाधि (Samadhi)
समाधि: मानव चेतना का सर्वोच्च शिखर
00:00 04:40

Samadhi is the glorious destination of the eightfold journey. It is not an unconscious trance or escapism; it is the most awake, lucid state possible. In Samadhi, the illusion of separateness between the seeker and the universe completely collapses. The ancient seer Patanjali calls this Kaivalya: the absolute liberation of the soul, shining in its own unblemished glory, free from suffering forever.

YS 3.3
तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः
Tad evartha-matra-nirbhasam svarupa-sunyam iva samadhih
जब ध्यान में ध्याता का अपना स्वरूप शून्य जैसा हो जाता है और केवल ध्येय का ही भान रहता है, उसे समाधि कहते हैं।

अभ्यास का लाभ

संसार के समस्त मानसिक क्लेशों और मृत्यु के भय से मुक्ति। आत्मा का परमात्मा के साथ पूर्ण मिलन और परम आनंद (कैवल्य)।

वैज्ञानिक व तंत्रिका आधार

मस्तिष्क के पैराइटल लोब में स्वयं और संसार के भेद का न्यूरोलॉजिकल विलोप, जिससे संपूर्ण एकात्मता और वैश्विक एकता का अनुभव होता है।

सप्रज्ञात समाधि
विचार, तर्क, आनंद और अस्मिता के साथ होने वाली समाधि जहां सत्य का स्पष्ट बोध होता है।
सत्य के साथ ऐसा तादात्म्य जहां समस्त संशय समाप्त हो जाते हैं।
असप्रज्ञात समाधि (निर्बीज)
मन के समस्त संस्कारों का शांत हो जाना, जहां केवल शुद्ध चैतन्य ही शेष रहता है।
परमात्म चेतना में बिना किसी विचार या कल्पना के शाश्वत रूप से लीन रहना।
कैवल्य (परम मुक्ति)
पुरुष (आत्मा) का प्रकृति के बंधनों से सदा के लिए मुक्त होकर अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो जाना।
जीवनमुक्त होकर संसार में रहते हुए भी किसी भी दुख या भय से अछूते रहना।
दैनिक क्रिया अपने दैनिक अभ्यास के अंत में 5 मिनट बिना कुछ किए, बिना किसी चाह के केवल अपने आत्म-स्वरूप में विश्राम करें।
आत्म-चिंतन प्रश्न यदि मेरे पद, नाम, संपत्ति और शरीर के विचार हट जाएं, तो वह कौन सी शुद्ध चेतना है जो सदा विद्यमान रहती है?
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समग्र साधना की कुंजी अष्टांग योग कोई क्रमिक सीढ़ी नहीं बल्कि एक जीवित वृक्ष की आठ शाखाएं हैं। जब आप आसन करते हैं, तो यम और श्वास साथ चलते हैं। जब आप ध्यान करते हैं, तो संतोष और सत्य स्थिर रहते हैं। आज जहाँ हैं वहीं से शुरू करें।
Kriyasya
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