Skip to main content
← हब
शास्त्रीय शास्त्र अन्वेषक
English में भी उपलब्ध — ऊपर नेविगेशन से बदलें
प्रामाणिक योग शास्त्र परंपरा

शास्त्रीय योग ग्रंथ अन्वेषक

हठयोग प्रदीपिका, घेरण्ड संहिता एवं शिव संहिता के मूल श्लोक, पदच्छेद (पदार्थ), यौगिक रहस्य एवं त्रि-ध्वनि गुरु व्याख्यान।

कल्याण अस्वीकरण / Wellness Disclaimer: यहाँ प्रस्तुत योग अभ्यास, मुद्राएँ और श्वास तकनीकें शास्त्रीय परंपरा पर आधारित हैं और केवल शैक्षिक, कल्याण और समग्र जीवनशैली के उद्देश्यों के लिए हैं। ये किसी चिकित्सीय सलाह, निदान या उपचार का विकल्प नहीं हैं। कोई भी नया शारीरिक अभ्यास शुरू करने से पहले, विशेष रूप से यदि आपको पहले से कोई स्वास्थ्य समस्या है या आप गर्भवती हैं, तो योग्य चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें। अपने शरीर की सहज सीमा में ही अभ्यास करें।
हठयोग प्रदीपिका घेरण्ड संहिता महर्षि पतञ्जलि योगसूत्र

महर्षि पतञ्जलि योगसूत्र

महर्षि पतञ्जलि
चित्तवृत्ति निरोध एवं अष्टांग योग का दार्शनिक संविधान
शास्त्रीय अध्याय पाठक खोलें →

समाधि पाद: चित्त स्वरूप एवं समाधि

प्रमुख विषय: योग की परिभाषा (चित्तवृत्ति निरोध), 5 वृत्तियाँ, अभ्यास व वैराग्य, ईश्वर प्रणिधान, चित्त प्रसादन उपाय
PYS 1.2
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥
yogaś citta-vṛtti-nirodhaḥ ||
पदार्थ (शब्दार्थ): योगः (Yoga is) चित्त-वृत्ति-निरोधः (the intentional cessation of the fluctuating whirlpools of the mind).
भावार्थ: चित्त की वृत्तियों (विचार तरंगों व चंचलताओं) का सर्वथा निरोध (शांत व स्थिर होना) ही योग है।
यौगिक रहस्य व भाष्य: योग दर्शन का सर्वप्रमुख सूत्र—चित्त की चंचलता समाप्त होते ही दृष्टा अपने वास्तविक स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है।
00:00
PYS 1.33
मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम् ॥
maitrī-karuṇā-muditopekṣāṇāṁ sukha-duḥkha-puṇyāpuṇya-viṣayāṇāṁ bhāvanātaś citta-prasādanam ||
पदार्थ (शब्दार्थ): सुख (To the happy) मैत्री (friendliness) दुःख (to the suffering) करुणा (compassion) पुण्य (to the virtuous) मुदिता (joy/delight) अपुण्य (to the unvirtuous/harmful) उपेक्षाणाम् (equanimous neutrality) भावनातः (by cultivating these attitudes) चित्त-प्रसादनम् (the mind attains undisturbed clarity and serenity).
भावार्थ: सुखी जनों के प्रति मैत्री, दुःखियों के प्रति करुणा, पुण्यात्माओं के प्रति प्रसन्नता (मुदिता), और दुराचारियों के प्रति उपेक्षा (तटस्थता) की भावना रखने से चित्त में निर्मल शांति और प्रसन्नता उत्पन्न होती है।
यौगिक रहस्य व भाष्य: सामाजिक संबंधों में मानसिक शांति बनाए रखने के लिए पतंजलि के ये चार व्यवहार सूत्र अत्यंत व्यावहारिक हैं।
00:00

साधन पाद: अष्टांग योग एवं क्रियायोग

प्रमुख विषय: क्रियायोग, 5 क्लेश (अविद्या आदि), अष्टांग योग के 8 अंग और उनके सिद्धि लक्षण
PYS 2.29
यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि ॥
yama-niyamāsana-prāṇāyāma-pratyāhāra-dhāraṇā-dhyāna-samādhayo'ṣṭāv aṅgāni ||
पदार्थ (शब्दार्थ): यम (Yama) नियम (Niyama) आसन (Asana) प्राणायाम (Pranayama) प्रत्याहार (Pratyahara) धारणा (Dharana) ध्यान (Dhyana) समाधयः (and Samadhi) अष्टौ अङ्गानि (are the eight limbs of Yoga).
भावार्थ: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि—ये योग के आठ अंग हैं।
यौगिक रहस्य व भाष्य: अष्टांग योग का समग्र ढांचा जो साधक के बाह्य आचरण से लेकर आंतरिक समाधि तक का पूर्ण मार्ग प्रशस्त करता है।
00:00
PYS 2.46
स्थिरसुखमासनम् ॥
sthira-sukham āsanam ||
पदार्थ (शब्दार्थ): स्थिर (Steady, grounded, firm) सुखम् (comfortable, joyful, easeful) आसनम् (posture is).
भावार्थ: जो स्थिरता प्रदान करने वाला और सुखपूर्वक (कष्टरहित) हो, वही 'आसन' है।
यौगिक रहस्य व भाष्य: पतंजलि का आसन पर सर्वाधिक सारगर्भित सूत्र: स्थिरता और सुख का संतुलन।
00:00
Kriyasya
✦ Talk to AI Companion →