वास्तु मुहूर्त एवं गृह निर्माण गाइड
वृहत्संहिता एवं मुहूर्त चिंतामणि के अनुसार भूमि पूजन, खनन, शिलान्यास और आयाम शुद्धि की प्रामाणिक शास्त्रीय मार्गदर्शिका।
गृहारंभ खनन एवं शिलान्यास क्रम
Vastu Raj Vallabh 3:12 · Vishwakarma Prakashभूमि खनन और शिलान्यास का शास्त्रीय क्रम अत्यंत महत्वपूर्ण है। खुदाई का आरंभ सदैव पावन ईशान कोण से होता है, जबकि प्रथम शिला (आधार) नैऋत्य कोण में रखी जाती है।
1. खनन क्रम (खुदाई)
NE → SE → NW → SWखुदाई सदैव ईशान से आरंभ कर आग्नेय, वायव्य और अंत में नैऋत्य में समाप्त करें। भूमि की ढलान ईशान की ओर होनी चाहिए।
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ईशान (उत्तर-पूर्व):
सर्वप्रथम यहाँ से खुदाई आरंभ करें
गहराई व भार: सबसे उथला व हल्का · ईशान वास्तु पुरुष का मस्तक है; सर्वप्रथम यहाँ से आरंभ करने पर शांति व शुभता का वास होता है।
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आग्नेय (दक्षिण-पूर्व):
द्वितीय कोण खनन
गहराई व भार: मध्यम गहराई · सूर्य की दैनिक गति के अनुकूल पूर्व से आग्नेय की ओर कार्य आगे बढ़ाएँ।
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वायव्य (उत्तर-पश्चिम):
तृतीय कोण खनन
गहराई व भार: मध्यम-गहरा · भू-दाब के संतुलन हेतु वायु कोण का खनन तृतीय चरण में किया जाता है।
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नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम):
अंतिम कोण खनन
गहराई व भार: सर्वाधिक गहरा व भारी · भूमि का मुख्य आधार होने के कारण इसका खनन अंत में किया जाता है ताकि भार संतुलन बना रहे।
2. शिलान्यास क्रम (नींव स्थापना)
SW → SE → NW → NEशिलान्यास सदैव नैऋत्य कोण से प्रारंभ होकर दक्षिणावर्त दिशा में ईशान में समाप्त होता है। नैऋत्य सबसे ऊँचा व भारी होना चाहिए।
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नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम):
प्रथम शिला स्थापना (शिलान्यास)
आधार भार: सर्वाधिक भारी व मजबूत · भवन को अचल स्थिरता देने के लिए पृथ्वी तत्व नैऋत्य में प्रथम शिला रखी जाती है।
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आग्नेय (दक्षिण-पूर्व):
द्वितीय शिला चरण
आधार भार: मजबूत आधार · दक्षिण दिशा की दीवार को स्थायित्व प्रदान करता है।
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वायव्य (उत्तर-पश्चिम):
तृतीय शिला चरण
आधार भार: सामान्य आधार · पश्चिमी दीवार के आधार को पूर्ण करता है।
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ईशान (उत्तर-पूर्व):
अंतिम शिला चरण
आधार भार: सबसे हल्का व स्वच्छ · इसे हल्का रखा जाता है ताकि प्राण ऊर्जा निर्बाध रूप से भवन में प्रवेश कर सके।
भूमिगत जल स्रोत एवं बोरिंग निर्धारण
भूमिगत बोरिंग या जल हौज भू-ऊर्जा को गहराई से प्रभावित करता है। इसे सदैव अनुकूल जल दिशाओं में ही कराएं।
✓ शुभ बोरिंग स्थान
- ईशान (उत्तर-पूर्व) (NE): [Best / A+] सर्वोत्तम, सुख-समृद्धि व आरोग्य प्रदाता।
- उत्तर (N): [Auspicious / A] धन वृद्धि व कुबेर का आशीर्वाद।
- पूर्व (E): [Favourable / B+] मान-सम्मान व जीवन शक्ति में वृद्धि।
✕ वर्जित बोरिंग स्थान
- नैऋत्य (SW): अत्यंत गंभीर दोष, स्वास्थ्य व आर्थिक पतन।
- आग्नेय (SE): अग्नि-जल संघर्ष, पारिवारिक कलह व दुर्घटना भय।
- ब्रह्मस्थान (C): नाभि मर्म भेदन; संपूर्ण भवन में ऊर्जा असंतुलन।
- दक्षिण (S): विवाद, अनावश्यक खर्च व मानसिक अशांति।
