प्राचीन भारतीय स्थापत्य वेद का मूल आधार वास्तु पुरुष मंडल है। बृहत्संहिता और मानसार के अनुसार प्रत्येक भवन, फ्लैट या भूखंड एक सजीव ऊर्जावान ढांचा है। आवासीय भवनों में मुख्य रूप से 81 पदों वाला मंडूक मंडल (9x9 ग्रिड) प्रयुक्त होता है, जिसमें 45 अधिष्ठाता देवता अपने-अपने पदों में विराजमान रहते हैं और केंद्र में ब्रह्मस्थान स्थित होता है। इसके अतिरिक्त, इस ग्रिड के विकर्ण सूत्रों के परस्पर कटने से 9 महा-मर्मस्थान बनते हैं। इन मर्मस्थानों पर भारी खंभा, कील, सीढ़ी या सेप्टिक टैंक होना गृहस्वामी के स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए अत्यंत हानिकारक माना गया है। क्रियास्य वास्तु मंडल लेंस आपके फ्लोर प्लान पर इन 81 पदों और मर्मस्थानों का सटीक मानचित्रण करता है।
81 पद वास्तु मंडल के चार चक्र
- ब्रह्मस्थान (केंद्र के 9 पद): भवन की नाभि और चेतना का केंद्र। यह स्थान पूर्णतः भार-मुक्त, स्वच्छ और प्रकाशवान होना चाहिए।
- दैविक पद (12 पद): आंतरिक परिधि जो आंतरिक ऊर्जा और आध्यात्मिक शांति को नियंत्रित करती है।
- मानुष्य पद (20 पद): मानवीय व्यवहार, बुद्धि और सामाजिक प्रगति का आधार।
- पैशाच पद (बाह्य 32 पद): भवन की बाहरी दीवारें और 32 मुख्य द्वार पद।
अपने घर का वास्तु मंडल एवं मर्मस्थान देखें
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वास्तु मंडल लेंस खोलें→क्रियास्य पल्स पर प्रकाशित सामग्री पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक शोध के समन्वय पर आधारित एक शैक्षणिक पहल है। पाठकों से अपेक्षा की जाती है कि वे व्यक्तिगत विवेक का प्रयोग करें।
