वास्तु पुरुष मंडल सनातन स्थापत्य वेद की आधारशिला है। यह केवल एक ज्यामितीय नक्शा नहीं, बल्कि एक जीवंत ब्रह्मांडीय ऊर्जा ग्रिड है जिस पर वास्तु पुरुष अधोमुख लेटे हुए हैं। वृहत्संहिता और मानसार जैसे प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, किसी भी आवासीय या व्यावसायिक भवन में कुल 45 ऊर्जा क्षेत्र सक्रिय रहते हैं—जिनमें 32 बाह्य क्षेत्र (प्राकार देवता) और 13 आंतरिक ऊर्जा केंद्र शामिल हैं। जब कोई भवन इन सूक्ष्म ऊर्जा क्षेत्रों के अनुसार व्यवस्थित होता है, तो वहां रहने वालों को मानसिक स्पष्टता, निरंतर प्रगति और उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।
81 पदों का परमशायिक मंडल (गृहस्थ वास्तु ग्रिड)
मंदिरों में सामान्यतः 64-पद मंडूक मंडल का उपयोग होता है, जबकि आवासीय घरों में 81-पद परमशायिक मंडल की स्थापना की जाती है। इस ग्रिड में ऊर्जा की परतें इस प्रकार कार्य करती हैं:
- ब्रह्मस्थान (केंद्र): मध्य के 9 वर्ग पद साक्षात ब्रह्मा जी का स्थान हैं। यह पूर्णतः आकाश तत्व (ईथर) का क्षेत्र है, जिसे सदा खुला, स्वच्छ और भारमुक्त रखना अनिवार्य है।
- दैविक पद (आंतरिक वृत्त): चार प्रमुख शक्ति केंद्र—अर्यमा (पूर्व), विवस्वान (दक्षिण), मित्र (पश्चिम) और भूधर (उत्तर)—जो जीवन की स्थिरता का आधार बनाते हैं।
- मानुष पद (मध्यम क्षेत्र): यह व्यावहारिक मानवीय क्रियाकलापों, पारिवारिक संबंधों और भावनात्मक संतुलन को पोषित करता है।
- पैशाच पद (बाह्य परिधि): 32 परिधीय क्षेत्र जहां से बाहरी प्राण ऊर्जा और प्रकाश भवन के भीतर प्रवेश करते हैं।
क्रियास्य पल्स पर प्रकाशित सामग्री पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक शोध के समन्वय पर आधारित एक शैक्षणिक पहल है। पाठकों से अपेक्षा की जाती है कि वे व्यक्तिगत विवेक का प्रयोग करें।
