भवन निर्माण और उसमें वास करना केवल भौतिक कार्य नहीं, बल्कि पृथ्वी माता और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ जुड़ने का एक पावन संस्कार है। वास्तु शास्त्र में निर्माण से लेकर गृह वास तक तीन प्रमुख संस्कार विधान हैं: भूमि पूजन (शिलान्यास), शंकु स्थापना (नींव की पहली ईंट) और गृह प्रवेश। यदि निर्माण का आरम्भ वास्तु पुरुष की प्रतिकूल स्थिति में अथवा अशुभ नक्षत्रों में किया जाए, तो निर्माण में अकारण विलंब, धन हानि और कारीगरों के साथ विवाद होते हैं। इसके विपरीत, राहु मुख के त्याग, दिग्बली दिशा और शुभ तिथियों में किए गए कार्य से भवन शीघ्र और निर्विघ्न संपन्न होता है। क्रियास्य वास्तु मुहूर्त गाइड आपके स्थान के अनुसार सबसे पावन मुहूर्तों की गणना करती है।
तीन प्रमुख वास्तु संस्कार
- भूमि पूजन: ईशान कोण में भूमि का विधिवत पूजन कर पृथ्वी माता और पाताल लोक के स्वामियों से निर्माण की आज्ञा लेना।
- शंकु स्थापना: सूर्य के राशि परिवर्तन के अनुसार नींव की पहली आधारशिला रखना, जो भवन को स्थिरता प्रदान करती है।
- गृह प्रवेश: नए घर में मंगल कलश, गो-माता और अग्नि स्थापना के साथ शुभ लग्न में पावन प्रवेश।
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वास्तु मुहूर्त खोलें→क्रियास्य पल्स पर प्रकाशित सामग्री पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक शोध के समन्वय पर आधारित एक शैक्षणिक पहल है। पाठकों से अपेक्षा की जाती है कि वे व्यक्तिगत विवेक का प्रयोग करें।
