वैदिक ज्योतिष का सर्वोच्च उद्देश्य जीवात्मा को उसके मूल स्वरूप और परमात्मा से साक्षात्कार कराना है। जन्म कुंडली में मोक्ष त्रिकोण (4, 8, 12 भाव), धर्म त्रिकोण (1, 5, 9 भाव), जैमिनी ज्योतिष का आत्मकारक ग्रह और कारकांश लग्न आत्मा के आध्यात्मिक सफर को दर्शाते हैं। कारकांश से द्वादश भाव के स्वामी व उसमें स्थित ग्रह से जातक के इष्ट देव का निर्धारण होता है, जिनकी उपासना से जन्म-जन्मांतर के कर्म कट जाते हैं। क्रियास्य आध्यात्मिक साधना रिपोर्ट साधक को उसके व्यक्तिगत मंत्र और ध्यान मार्ग से जोड़ती है।
आध्यात्मिक साधना के प्रमुख सूत्र
कुंडली में आत्मकारक ग्रह आत्मा की मूल इच्छा को प्रकट करता है। कारकांश लग्न से द्वादश भाव में सूर्य होने पर शिव उपासना, चन्द्रमा पर माता गौरी, मंगल पर कार्तिकेय/हनुमान, बुध पर नारायण/विष्णु, गुरु पर शिव/सदाशिव, शुक्र पर लक्ष्मी, शनि पर यम/भैरव और केतु पर भगवान गणेश की उपासना से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। विंशांश (D20) कुंडली साधना सिद्धि का अंतिम पैमाना है।
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साधना रिपोर्ट खोलें→क्रियास्य पल्स पर प्रकाशित सामग्री पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक शोध के समन्वय पर आधारित एक शैक्षणिक पहल है। पाठकों से अपेक्षा की जाती है कि वे व्यक्तिगत विवेक का प्रयोग करें।
