Skip to main content
Tools

शोक, दुःख और दीर्घकालिक शोक: ड्यूल प्रोसेस मॉडल, वोर्डन सिद्धांत और सांत्वना

शोक के मनोवैज्ञानिक चरण, दीर्घकालिक शोक विकार (PGD) के लक्षण और निरंतर बंधन सिद्धांत पर 23 संरचित पाठ।

English Edition Read in Hindi
By Kriyasya Companion 2 min read Updated October 23, 2026

शोक (Grief) किसी आत्मीय जन को खोने पर उत्पन्न होने वाली एक सार्वभौमिक और स्वाभाविक भावनात्मक व शारीरिक प्रतिक्रिया है। आधुनिक मनोचिकित्सा (DSM-5-TR और ICD-11) के अनुसार, यदि किसी प्रियजन की मृत्यु के 12 महीने बाद भी तीव्र तड़प, खुद की पहचान खो जाने का अहसास और सामान्य जीवन जीने में असमर्थता बनी रहे, तो इसे दीर्घकालिक शोक विकार (Prolonged Grief Disorder - PGD) कहा जाता है। मार्गरेट स्ट्रोबे और हेंक शट के ड्यूल प्रोसेस मॉडल (1999) तथा विलियम वोर्डन के शोक सिद्धांतों पर आधारित शोक, दुःख और दीर्घकालिक शोक मनोशिक्षा मॉड्यूल 23 पाठों में स्वस्थ शोक प्रक्रिया और स्मृतियों के साथ जीने का वैज्ञानिक मार्गदर्शन करता है।

ड्यूल प्रोसेस मॉडल: संतुलन का विज्ञान

शोक कोई सीधी रेखा नहीं है। स्वस्थ शोक में व्यक्ति दो स्थितियों के बीच डोलता है: कभी वह रोकर और याद करके अपने दर्द को महसूस करता है (हानि-उन्मुख), तो कभी नए काम सीखकर, घर संभालकर या काम पर जाकर जीवन को आगे बढ़ाता है (बहाली-उन्मुख)। दोनों के बीच का यह संतुलन ही हीलिंग लाता है।

निरंतर बंधन सिद्धांत (Continuing Bonds)

आधुनिक मनोविज्ञान मानता है कि हीलिंग का अर्थ प्रियजन को भुलाना नहीं है, बल्कि उनकी अच्छी सीख और यादों को संजोते हुए अपने जीवन को एक नया और सार्थक रूप देना है।

संपादकीय एवं शैक्षणिक अस्वीकरण

क्रियास्य पल्स पर प्रकाशित सामग्री पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक शोध के समन्वय पर आधारित एक शैक्षणिक पहल है। पाठकों से अपेक्षा की जाती है कि वे व्यक्तिगत विवेक का प्रयोग करें।

Share This Insight Tools

शोक के मनोवैज्ञानिक चरण, दीर्घकालिक शोक विकार (PGD) के लक्षण और निरंतर बंधन सिद्धांत पर 23 संरचित पाठ।

शोक, दुःख और दीर्घकालिक शोक: ड्यूल प्रोसेस मॉडल, वोर्डन सिद्धांत और सांत्वना

Share to WhatsApp Post