आधुनिक क्रोनोबायोलॉजी द्वारा जैविक घड़ी (Circadian Clock) की खोज से सहस्रों वर्ष पूर्व आयुर्वेद ने दिनचर्या का विज्ञान प्रतिपादित किया था। आयुर्वेद के अनुसार 24 घंटे के दिन-रात को 4-4 घंटे के छह चक्रों में बांटा गया है, जो क्रमशः वात, पित्त और कफ के प्रभाव में रहते हैं। ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से 96 मिनट पूर्व) में जागने से शरीर में वात का हल्कापन और मानसिक स्पष्टता मिलती है; जबकि दोपहर में पित्त काल (10 से 2 बजे) में दिन का मुख्य भोजन करने से पाचन अग्नि (जठराग्नि) सर्वोच्च स्तर पर कार्य करती है। क्रियास्य दिनचर्या स्टूडियो आपको अपनी दिनचर्या को प्राकृतिक चक्र के साथ जोड़ने का वैज्ञानिक मार्ग बताता है।
दिनचर्या के प्रमुख नियम
- प्रातः काल (कफ काल 6-10 AM): हल्का व्यायाम, दंतधावन, जिह्वा निर्लेखन (जीभ साफ करना) और उषापान (हल्का गुनगुना पानी)।
- मध्याह्न काल (पित्त काल 10 AM-2 PM): दिन का सबसे भारी और पौष्टिक भोजन। इस समय पाचन अग्नि सर्वाधिक तीव्र होती है।
- संध्या काल (कफ काल 6-10 PM): सूर्यास्त के समय हल्का सुपाच्य भोजन और रात्रि 10 बजे से पूर्व शयन।
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दिनचर्या स्टूडियो खोलें→क्रियास्य पल्स पर प्रकाशित सामग्री पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक शोध के समन्वय पर आधारित एक शैक्षणिक पहल है। पाठकों से अपेक्षा की जाती है कि वे व्यक्तिगत विवेक का प्रयोग करें।
