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संपूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता ऑनलाइन: 18 अध्याय, 700 श्लोक, संस्कृत पाठ और प्रामाणिक व्याख्या

श्रीमद्भगवद्गीता के सभी 18 अध्यायों और 700 श्लोकों का प्रामाणिक संस्कृत पाठ, अन्वय, हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद और दार्शनिक व्याख्या का संपूर्ण संकलन।

English Edition Read in Hindi
By Kriyasya Companion 3 min read Updated October 24, 2026

श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत के भीष्म पर्व का एक अत्यंत पावन और अमूल्य अंग है, जिसमें 18 अध्याय और कुल 700 श्लोक समाहित हैं। यह संपूर्ण वैदिक ज्ञान और उपनिषदों का सार (सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनंदनः) माना जाता है। गीता का ज्ञान एक क्रमबद्ध आध्यात्मिक यात्रा है—पहले अध्याय में अर्जुन के गहरे मानसिक विषाद से लेकर 18वें अध्याय के अंतिम मोक्ष-संन्यास योग तक। संपूर्ण गीता को तीन प्रमुख खंडों (षट्क) में विभाजित किया गया है: प्रथम 6 अध्याय कर्मयोग का विवेचन करते हैं; मध्य के 6 अध्याय भक्तियोग और ईश्वर के विराट स्वरूप का दर्शन कराते हैं; और अंतिम 6 अध्याय ज्ञानयोग, तीन गुणों के रहस्य और आत्मा-परमात्मा के ऐक्य का उद्घाटन करते हैं। संपूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता ऑनलाइन पोर्टल प्रत्येक श्लोक का प्रामाणिक संस्कृत पाठ, अन्वय, शब्दार्थ, हिंदी-अंग्रेजी अनुवाद और आचार्यों की व्याख्याओं का एक समृद्ध डिजिटल भंडार प्रस्तुत करता है।

गीता के 18 अध्यायों की त्रि-षट्क संरचना

षट्क विभाजन अध्याय क्रम मूल दार्शनिक विषय
प्रथम षट्क: कर्मयोग अध्याय 1 से 6 (अर्जुनविषाद से ध्यानयोग) 'त्वम्' पद का विचार; कर्तव्य पालन, आसक्ति-रहित कर्म और मन को ध्यान में एकाग्र करने की विधि।
द्वितीय षट्क: भक्तियोग अध्याय 7 से 12 (ज्ञानविज्ञान से भक्तियोग) 'तत्' पद का विचार; ईश्वर का ऐश्वर्य, विभूति, विश्वरूप दर्शन और अनन्य प्रेममयी भक्ति।
तृतीय षट्क: ज्ञानयोग अध्याय 13 से 18 (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ से मोक्षसंन्यास) 'असि' पद का विचार; प्रकृति और पुरुष का विवेक, तीनों गुणों से मुक्ति और परम शरणागति।

गीता के 18 अध्यायों की संक्षिप्त रूपरेखा

  1. अध्याय 1: अर्जुनविषादयोग — मोह, संशय और मानसिक संघर्ष का आरम्भ।
  2. अध्याय 2: सांख्ययोग — आत्मा की अमरता, कर्तव्य और स्थितप्रज्ञ के लक्षण।
  3. अध्याय 3: कर्मयोग — सृष्टि चक्र और निष्काम कर्म का अमर संदेश।
  4. अध्याय 4: ज्ञानकर्मसंन्यासयोग — अवतार का रहस्य और ज्ञान रूपी अग्नि से कर्मों की शुद्धि।
  5. अध्याय 5: कर्मसंन्यासयोग — संन्यास और कर्मयोग का समन्वय।
  6. अध्याय 6: आत्मसंयमयोग (ध्यानयोग) — मन के नियंत्रण और ध्यान की व्यावहारिक विधि।
  7. अध्याय 7 से 12: विज्ञान, अक्षरब्रह्म, राजविद्या, ईश्वरीय विभूतियां, विराट विश्वरूप और भक्ति का शिखर।
  8. अध्याय 13 से 18: शरीर और आत्मा का भेद, प्रकृति के तीन गुण, पुरुषोत्तम योग, दैवासुर संपद्, श्रद्धा के तीन प्रकार और 18.66 में भगवान की परम शरणागति।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पहली बार गीता पढ़ने वाले को किस अध्याय से शुरुआत करनी चाहिए?

अध्याय 2 (सांख्ययोग) से शुरुआत करना सबसे उत्तम है, क्योंकि इसमें संपूर्ण गीता के दार्शनिक सिद्धांतों और कर्मयोग का सार समाहित है।

श्लोक 18.66 (सर्वधर्मान्परित्यज्य) का क्या महत्व है?

यह गीता का चरम श्लोक (महामंत्र) है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण सभी प्रकार के संशयों और बंधनों को त्यागकर केवल उनकी शरण में आने वाले भक्त को सभी पापों और भयों से मुक्त करने का अभयदान देते हैं।

संपादकीय एवं शैक्षणिक अस्वीकरण

क्रियास्य पल्स पर प्रकाशित सामग्री पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक शोध के समन्वय पर आधारित एक शैक्षणिक पहल है। पाठकों से अपेक्षा की जाती है कि वे व्यक्तिगत विवेक का प्रयोग करें।

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संपूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता ऑनलाइन: 18 अध्याय, 700 श्लोक, संस्कृत पाठ और प्रामाणिक व्याख्या

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