प्रातःकाल के प्रथम 30 मिनट यह निर्धारित करते हैं कि आपका पूरा दिन ऊर्जावान रहेगा या आलस्य से भरा। आयुर्वेद में प्रातः जागरण के पश्चात तीन पावन क्रियाओं का विशेष महत्व है: जिह्वा निर्लेखन (जीभ साफ करना), गंडूष (ऑयल पुलिंग) और उषापान (गुनगुना पानी पीना)। रात्रि में शयन के समय शरीर का सारा अधपचा विष (आम) जीभ पर सफेद परत के रूप में जमा हो जाता है; इसे तांबे अथवा स्टील के छिलनी से साफ करना पाचन तंत्र को सक्रिय करता है। तिल के तेल से कुल्ला (ऑयल पुलिंग) करने से दांत और मसूड़े वज्र के समान मजबूत होते हैं, और उषापान से आंतों का मल सहज बाहर निकल जाता है। क्रियास्य प्रातःकालीन पेसर इन आदतों को सहज बनाता है।
प्रातःकालीन स्वास्थ्य के तीन नियम
- जिह्वा निर्लेखन: तांबे के छिलने से जीभ को 5-7 बार साफ करें ताकि स्वाद कलिकाएं जागृत हों और टॉक्सिन साफ हों।
- गंडूष (ऑयल पुलिंग): एक चम्मच तिल अथवा नारियल तेल को मुंह में 5-10 मिनट तक घुमाएं और थूक दें। यह मसूड़ों के रोगों और पायरिया को रोकता है।
- उषापान: सुबह खाली पेट 1-2 गिलास गुनगुना पानी पिएं, जिससे पेट साफ होता है और कब्ज का नाश होता है।
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क्रियास्य प्रातःकालीन पेसर द्वारा अपनी स्वस्थ आदतों को ट्रैक करें और दिन भर तरोताजा रहें।
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