प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला में किसी भी कक्ष अथवा भवन की लंबाई और चौड़ाई का निर्धारण मनमाने ढंग से नहीं किया जाता था। महर्षि मय और विश्वकर्मा ने मानसार में आयादि षड्वर्ग (छह शास्त्रीय सूत्र) का प्रतिपादन किया है। भवन की परिधि (Perimeter) के आधार पर छह प्रमुख गणितीय अनुपात निकाले जाते हैं: आय, व्यय, योनि, नक्षत्र, वय (आयु) और तिथि। वास्तु शास्त्र का स्वर्णिम नियम है कि भवन की 'आय' उसके 'व्यय' से अधिक होनी चाहिए (`आय > व्यय`), और 'योनि' विषम (ध्वज, सिंह, वृष, गज) होनी चाहिए। क्रियास्य आयादि लेंस आपके प्रत्येक कमरे की लंबाई-चौड़ाई के आधार पर इन सभी अनुपातों की सटीक गणना करता है।
आयादि षड्वर्ग के छह शास्त्रीय सूत्र
- आय (लाभ): धन और समृद्धि का पैमाना। आय का अंक व्यय से बड़ा होना अनिवार्य है।
- व्यय (खर्च): आकस्मिक खर्चों का सूचक। यह आय से कम होना चाहिए।
- योनि (दिशात्मक ऊर्जा): 8 योनियों में विषम योनियां — ध्वज (1), सिंह (3), वृषभ (5) और गज (7) — अत्यंत शुभ मानी जाती हैं।
- नक्षत्र: भवन के नक्षत्र का गृहस्वामी के जन्म नक्षत्र से मैत्री संबंध होना चाहिए।
- वय (आयु): भवन के स्थायित्व और दीर्घायु की पुष्टि करता है।
अपने कमरों के आयादि अनुपातों की जांच करें
क्रियास्य आयादि लेंस द्वारा अपने कमरे की परिधि के आधार पर आय, व्यय और शुभ योनि का विश्लेषण करें।
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