सनातन धर्म में संतानोत्पत्ति को गृहस्थ जीवन का एक पावन संस्कार माना गया है। वैदिक ज्योतिष में संतान सुख का विचार मुख्य रूप से पंचम भाव (संतान भाव), संतान कारक देवगुरु बृहस्पति और सप्तमांश (D7 कुंडली) से किया जाता है। इसके अतिरिक्त, महर्षि पराशर ने पुरुष की जनन क्षमता के लिए बीज स्फुट और स्त्री के लिए क्षेत्र स्फुट की गणना का विशेष निर्देश दिया है। क्रियास्य संतान प्राप्ति कैलकुलेटर इन सभी शास्त्रीय पैमानों का विश्लेषण कर गर्भधारण और संतान सुख के लिए शुभ समय की पहचान करता है।
संतान विचार के प्रमुख शास्त्रीय सूत्र
- पंचम भाव एवं पंचमेश: पंचम भाव पर शुभ ग्रहों (गुरु, शुक्र) की दृष्टि संतान सुख को सुगम बनाती है। राहु या केतु का प्रभाव सर्प दोष अथवा पितृ दोष के कारण विलंब करा सकता है।
- बीज स्फुट एवं क्षेत्र स्फुट: पुरुष की कुंडली में सूर्य, शुक्र व गुरु के अंशों से 'बीज स्फुट' और स्त्री की कुंडली में चन्द्र, मंगल व गुरु के अंशों से 'क्षेत्र स्फुट' निकाला जाता है, जो शारीरिक व आत्मिक उर्वरता की पुष्टि करते हैं।
- सप्तमांश (D7) कुंडली: संतान की संख्या, स्वास्थ्य और दीर्घायु का अंतिम निर्णय सप्तमांश कुंडली के आधार पर होता है।
संतान प्राप्ति का शुभ समय जानें
क्रियास्य संतान कैलकुलेटर द्वारा अपनी जन्म कुंडली और सप्तमांश चार्ट के आधार पर अनुकूल समय व शास्त्रीय उपाय देखें।
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