किसी भी भवन की ऊर्जा का मूल आधार वह भूमि है जिस पर उसका निर्माण होता है। यदि भूमि स्वयं ऊर्जाहीन या दूषित है, तो उस पर बने सुंदर से सुंदर मकान में भी शांति और समृद्धि नहीं ठहर पाती। विश्वकर्मा प्रकाश के अनुसार, भूमि का ढलान, उसका ज्यामितीय आकार और मार्ग वेध (वीथि शूल) किसी भी भवन के वास्तु परिणाम का 60% तय करते हैं। नींव रखने से पूर्व भूमि के इन लक्षणों की जांच करने से भविष्य के गंभीर संकटों से बचा जा सकता है।
भूखंड का आकार: गौमुखी बनाम शेरमुखी
भूमि का आकार तय करता है कि वहां रहने वालों के जीवन में ऊर्जा का प्रवाह स्थिर रहेगा या अस्थिर:
- गौमुखी भूखंड (गाय के मुख जैसा): आगे से संकरा और पीछे से चौड़ा। यदि इसका मुख उत्तर या पूर्व में हो और पिछला भाग दक्षिण या पश्चिम में विस्तृत हो, तो यह निवास के लिए अत्यंत शुभ और समृद्धिदायक होता है। यह व्यावसायिक गतिविधियों के लिए उपयुक्त नहीं है।
- शेरमुखी भूखंड (सिंह के मुख जैसा): आगे से चौड़ा और पीछे से संकरा। यह तेज और गतिशील ऊर्जा का केंद्र है, जो व्यापारिक संस्थानों, शोरूम और कंपनियों के लिए अत्यंत लाभकारी होता है, परंतु घर के लिए वर्जित है।
- त्रिकोणीय या अनियमित भूखंड: ऐसे भूखंडों में ऊर्जा का भंवर उत्पन्न होता है। इन्हें तांबे या पीतल के ऊर्जा तारों से समकोण बनाकर ही निर्माण योग्य बनाया जाता है।
