मानव शरीर केवल हड्डियों और मांस का ढांचा नहीं, बल्कि सूक्ष्म प्राण ऊर्जा (प्राणमय कोष) का एक दिव्य मंदिर है। हमारी रीढ़ की हड्डी में सात प्रमुख ऊर्जा केंद्र स्थित हैं जिन्हें सप्त चक्र कहा जाता है: मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्रार। मूलाधार में सुप्त पड़ी आत्म-शक्ति को कुंडलिनी शक्ति कहा जाता है। जब प्राणायाम, बंध और बीज मंत्रों के माध्यम से प्राण को सुषुम्ना नाड़ी में प्रवाहित किया जाता है, तो यह दिव्य शक्ति क्रमशः चक्रों का भेदन करती हुई सहस्रार में परम शिव से एकाकार हो जाती है। क्रियास्य कुंडलिनी स्टूडियो चक्रों के संतुलित विकास का सुरक्षित और प्रामाणिक मार्ग बताता है।
सप्त चक्र एवं उनके बीज मंत्र
- मूलाधार (पृथ्वी - लं): स्थिरता, सुरक्षा और शारीरिक बल।
- स्वाधिष्ठान (जल - वं): रचनात्मकता, भावनाएं और काम शक्ति का संतुलन।
- मणिपुर (अग्नि - रं): इच्छाशक्ति, आत्मविश्वास और प्रचंड पाचन अग्नि।
- अनाहत (वायु - यं): निस्वार्थ प्रेम, करुणा और हृदय की शांति।
- विशुद्ध (आकाश - हं): सत्य वाणी और अभिव्यक्ति की क्षमता।
- आज्ञा (मन - ॐ): दिव्य दृष्टि, अंतर्ज्ञान और विवेक।
- सहस्रार: परम मोक्ष और अखंड आत्म-साक्षात्कार।
अपने सात चक्रों की ऊर्जा को संतुलित करें
क्रियास्य कुंडलिनी स्टूडियो द्वारा चक्र ध्यान, बीज मंत्र और मेरुदंडीय प्राणायाम का अभ्यास करें।
कुंडलिनी स्टूडियो खोलें→