प्यास लगती है तो,
पनघट की याद आती है,
लाज लगती है तो,
घूँघट की याद आती है,
उम्र बढ़ती है तो,
बचपन की याद आती है,
जब बुढ़ापा आ जाता है,
तो मरघट की याद आती है।
जा काया नहीं है तेरी,
काहे करे मेरी और तेरी।।
पल की करेंगे न देरी,
काहे करे मेरी और तेरी।।
ले जइहे पकड़ बरजोरी,
काहे करे मेरी और तेरी।।
बन जावे राख की ढेरी,
काहे करे मेरी और तेरी।।
काहे करे मेरी और तेरी।।
Pyaas Lagti Hai To,
Panghat Ki Yaad Aati Hai,
Laaj Lagti Hai To,
Ghunghat Ki Yaad Aati Hai,
Umr Badhati Hai To,
Bachpan Ki Yaad Aati Hai,
Jab Budhapa Aa Jata Hai,
To Marghat Ki Yaad Aati Hai.
Ja Kaya Nahin Hai Teri,
Kahe Kare Meri Aur Teri.
Pal Ki Karenge Na Deri,
Kahe Kare Meri Aur Teri.
Le Jaihe Pakad Barjori,
Kahe Kare Meri Aur Teri.
Ban Jave Raakh Ki Dheri,
Kahe Kare Meri Aur Teri.
Kahe Kare Meri Aur Teri.
इस भजन का मुख्य संदेश है कि यह शरीर स्थायी नहीं है, जीवन क्षणभंगुर है, और अंत में सब कुछ यहीं छूट जाना है। इसलिए मनुष्य को घमंड, स्वार्थ, झूठे संबंधों और देह अभिमान में नहीं फँसना चाहिए।
It reminds listeners that the body does not truly belong to us forever, and worldly ego, attachment, pride, and “mine versus yours” thinking are ultimately meaningless.
satsang, devotional gatherings, spiritual reflection, vairagya bhajans, pravachan settings, and meditative bhakti sessions.
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