आयुर्वेद का अमर सिद्धांत है: *'रोगाः सर्वेऽपि मन्दौ'*, अर्थात संसार के समस्त रोगों का मूल कारण मंद पाचन अग्नि है। हमारे शरीर में भोजन को ऊर्जा और धातुओं में बदलने वाली शक्ति को जठराग्नि (Agni) कहा जाता है। जब अग्नि संतुलित होती है, तो शरीर में ओजस (जीवन शक्ति व रोग प्रतिरोधक क्षमता) का निर्माण होता है। इसके विपरीत, जब पाचन अग्नि मंद या अनियमित होती है, तो अधपचा भोजन आंतों में सड़कर एक चिपचिपा, विषैला तत्व बनाता है जिसे 'आम' (Ama) कहते हैं। यह आम रक्त वाहिकाओं और जोड़ों में पहुंचकर गठिया, मोटापा, कोलेस्ट्रॉल और थकान जैसी व्याधियां पैदा करता है। क्रियास्य अग्नि एवं आम परीक्षण द्वारा आप अपनी पाचन क्षमता की जांच कर सकते हैं।
जठराग्नि के चार प्रकार
- समाग्नि (संतुलित अग्नि): समय पर भूख लगना, बिना गैस या भारीपन के सहज पाचन।
- विषमाग्नि (अनियमित वात अग्नि): कभी तीव्र भूख तो कभी बिल्कुल न लगना; पेट फूलना और गैस।
- तीक्ष्णाग्नि (अति-तीव्र पित्त अग्नि): अत्यधिक भूख, सीने में जलन और एसिडिटी।
- मंदाग्नि (धीमी कफ अग्नि): भूख न लगना, भोजन के बाद भारीपन और सुस्ती।
अपनी जठराग्नि का प्रकार जानें
क्रियास्य अग्नि परीक्षण द्वारा अपनी पाचन शक्ति का स्तर देखें और सोंठ, जीरा व त्रिकटु द्वारा आम दोष दूर करने के उपाय पाएं।
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